श्रवण से स्मरण तक — भक्ति की एक सहज राह।
आपकी रोज़ की भक्ति का साथी। शास्त्रों के वचन और उनका सरल अर्थ सुनिए, नाम-स्मरण और मौन में ठहरिए, और उस भाव को अपने दिन में साथ ले जाइए — जब भी आपका मन हो।
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गीता १७.२३ ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः।
हमारे शब्दों में
ॐ, तत्, सत् — इन तीन शब्दों को एक ही परमात्मा के नाम माना गया है। आदि में उसी से ज्ञानी जन, वेद और यज्ञ रचे गए।
नमूना सत्संग इसी श्लोक पर है — तत्सत् नाम भी इसी से।
गीता ९.२६ पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।
हमारे शब्दों में
पत्ता, फूल, फल, जल — जो कोई मुझे भक्ति से देता है, उस सच्चे मन वाले का भक्ति से लाया हुआ वह — मैं ले लेता हूँ।
गीता ७.८ रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभाऽस्मि शशिसूर्ययोः।
हमारे शब्दों में
अर्जुन, पानी में जो रस है, वह मैं हूँ; चंद्रमा और सूर्य की प्रभा मैं हूँ। सब वेदों में ॐ, आकाश में शब्द और मनुष्यों में सामर्थ्य मैं हूँ।
गीता ६.४७ योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना।
हमारे शब्दों में
सब योगियों में भी — जिसका अंतर्मन मुझमें लगा हो और जो श्रद्धा से मुझे भजे, उसे मैं अपने सबसे पास मानता हूँ।
गीता ६.१९ यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता।
हमारे शब्दों में
जहाँ हवा नहीं पहुँचती, वहाँ रखे दीये की लौ नहीं काँपती — मन को साधकर ध्यान में लगे योगी के चित्त के लिए यही उपमा कही गई है।
सभी श्लोक यात्रा · ११–२० अक्टूबर
नवरात्रि साधना नौ दिन, नौ रूप · प्रतिपदा से विजयादशमी तक
यात्रा देखें Cited, never invented.
हर बात का प्रमाण — अध्याय, श्लोक के साथ। सत्संग की हर बात के पीछे अध्याय और श्लोक है — छूकर मूल पाठ और लिप्यन्तरण देखें, और जहाँ अर्थ परखा जा चुका है, हमारे शब्द भी। हम मूल का ही उद्धरण देते हैं, किसी टीका का नहीं।
तत्सत् का भक्ति-सत्संग कैसे बनता है यह आपकी अपनी पूजा-आरती का स्थान नहीं लेता — उसका साथी है।