Cited, never invented.
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तत्सत् के सत्संगों में आए श्लोक — गीता और दुर्गा सप्तशती से; मूल पाठ और उसका लिप्यंतरण।
सत्संग की हर बात के पीछे अध्याय और श्लोक है — छूकर मूल पाठ और लिप्यन्तरण देखें, और जहाँ अर्थ परखा जा चुका है, हमारे शब्द भी। हम मूल का ही उद्धरण देते हैं, किसी टीका का नहीं।
तत्सत् का भक्ति-सत्संग कैसे बनता हैगीता ६.१९
यथा दीपो निवातस्थोनेङ्गते सोपमा स्मृता।योगिनो यतचित्तस्ययुञ्जतो योगमात्मनः॥॥ ६.१९ ॥
yathā dīpo nivātastho neṅgate sopamā smṛtā / yogino yata-cittasya yuñjato yogam ātmanaḥ
हमारे शब्दों में
जहाँ हवा नहीं पहुँचती, वहाँ रखे दीये की लौ नहीं काँपती — मन को साधकर ध्यान में लगे योगी के चित्त के लिए यही उपमा कही गई है।
श्लोक-पाठ