Cited, never invented.
सभी श्लोक
तत्सत् के सत्संगों में आए श्लोक — गीता और दुर्गा सप्तशती से; मूल पाठ और उसका लिप्यंतरण।
सत्संग की हर बात के पीछे अध्याय और श्लोक है — छूकर मूल पाठ और लिप्यन्तरण देखें, और जहाँ अर्थ परखा जा चुका है, हमारे शब्द भी। हम मूल का ही उद्धरण देते हैं, किसी टीका का नहीं।
तत्सत् का भक्ति-सत्संग कैसे बनता हैगीता ९.२७
यत्करोषि यदश्नासियज्जुहोषि ददासि यत्।यत्तपस्यसि कौन्तेयतत्कुरुष्व मदर्पणम्॥॥ ९.२७ ॥
yat karoṣi yad aśnāsi yaj juhoṣi dadāsi yat / yat tapasyasi kaunteya tat kuruṣva mad-arpaṇam
हमारे शब्दों में
जो कुछ करते हो, जो खाते हो, जो हवन करते हो, जो दान देते हो, जो तप करते हो, अर्जुन — वह सब मुझे अर्पित कर दो।