Cited, never invented.
सभी श्लोक
तत्सत् के सत्संगों में आए श्लोक — गीता और दुर्गा सप्तशती से; मूल पाठ और उसका लिप्यंतरण।
सत्संग की हर बात के पीछे अध्याय और श्लोक है — छूकर मूल पाठ और लिप्यन्तरण देखें, और जहाँ अर्थ परखा जा चुका है, हमारे शब्द भी। हम मूल का ही उद्धरण देते हैं, किसी टीका का नहीं।
तत्सत् का भक्ति-सत्संग कैसे बनता हैगीता ६.२८
युञ्जन्नेवं सदाऽऽत्मानंयोगी विगतकल्मषः।सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शम्अत्यन्तं सुखमश्नुते॥॥ ६.२८ ॥
yuñjann evaṁ sadātmānaṁ yogī vigata-kalmaṣaḥ / sukhena brahma-saṁsparśam atyantaṁ sukham aśnute
हमारे शब्दों में
इसी तरह सदा अपने को योग में लगाए रखने वाला योगी, निर्मल होकर, सहज ही ब्रह्म के स्पर्श का असीम सुख पा लेता है।