Cited, never invented.
सभी श्लोक
तत्सत् के सत्संगों में आए श्लोक — गीता और दुर्गा सप्तशती से; मूल पाठ और उसका लिप्यंतरण।
सत्संग की हर बात के पीछे अध्याय और श्लोक है — छूकर मूल पाठ और लिप्यन्तरण देखें, और जहाँ अर्थ परखा जा चुका है, हमारे शब्द भी। हम मूल का ही उद्धरण देते हैं, किसी टीका का नहीं।
तत्सत् का भक्ति-सत्संग कैसे बनता हैगीता १५.१५
सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टोमत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च।वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्योवेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम्॥॥ १५.१५ ॥
sarvasya cāhaṁ hṛdi sanniviṣṭo mattaḥ smṛtir jñānam apohanaṁ ca / vedaiś ca sarvair aham eva vedyo vedānta-kṛd veda-vid eva cāham
हमारे शब्दों में
मैं सबके हृदय में बसा हूँ; स्मृति और ज्ञान मुझसे आते हैं, और उनका खो जाना भी। सब वेदों से जानने योग्य मैं ही हूँ; वेदान्त का कर्ता भी मैं हूँ और वेदों का ज्ञाता भी मैं ही।