Cited, never invented.
सभी श्लोक
तत्सत् के सत्संगों में आए श्लोक — गीता और दुर्गा सप्तशती से; मूल पाठ और उसका लिप्यंतरण।
सत्संग की हर बात के पीछे अध्याय और श्लोक है — छूकर मूल पाठ और लिप्यन्तरण देखें, और जहाँ अर्थ परखा जा चुका है, हमारे शब्द भी। हम मूल का ही उद्धरण देते हैं, किसी टीका का नहीं।
तत्सत् का भक्ति-सत्संग कैसे बनता हैगीता १७.२७
यज्ञे तपसि दाने चस्थितिः सदिति चोच्यते।कर्म चैव तदर्थीयंसदित्येवाभिधीयते॥॥ १७.२७ ॥
yajñe tapasi dāne ca sthitiḥ sad iti cocyate / karma caiva tad-arthīyaṁ sad ity evābhidhīyate
हमारे शब्दों में
यज्ञ में, तप में और दान में टिके रहना भी ‘सत्’ कहलाता है; और उसके लिए किया गया कर्म भी ‘सत्’ ही कहलाता है।