सभी श्लोकरोज़ दस मिनट का सत्संग।

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सभी श्लोक

तत्सत् के सत्संगों में आए श्लोक — गीता और दुर्गा सप्तशती से; मूल पाठ और उसका लिप्यंतरण।

सत्संग की हर बात के पीछे अध्याय और श्लोक है — छूकर मूल पाठ और लिप्यन्तरण देखें, और जहाँ अर्थ परखा जा चुका है, हमारे शब्द भी। हम मूल का ही उद्धरण देते हैं, किसी टीका का नहीं।

तत्सत् का भक्ति-सत्संग कैसे बनता है

श्लोक

गीता ६.२६

यतो यतो निश्चरतिमनश्चञ्चलमस्थिरम्।ततस्ततो नियम्यैतद्आत्मन्येव वशं नयेत्॥॥ ६.२६ ॥

yato yato niścarati manaś cañcalam asthiram / tatas tato niyamyaitad ātmany eva vaśaṁ nayet

हमारे शब्दों में

यह चंचल, अस्थिर मन जहाँ-जहाँ भटक जाए, साधक वहाँ-वहाँ से उसे रोककर लौटाए, और अपने ही भीतर वश में ले आए।

शास्त्रों की वाणी से रोज़ की भक्ति तक।

गीता ६.२६ · तत्सत्