Cited, never invented.
सभी श्लोक
तत्सत् के सत्संगों में आए श्लोक — गीता और दुर्गा सप्तशती से; मूल पाठ और उसका लिप्यंतरण।
सत्संग की हर बात के पीछे अध्याय और श्लोक है — छूकर मूल पाठ और लिप्यन्तरण देखें, और जहाँ अर्थ परखा जा चुका है, हमारे शब्द भी। हम मूल का ही उद्धरण देते हैं, किसी टीका का नहीं।
तत्सत् का भक्ति-सत्संग कैसे बनता हैगीता ६.२६
यतो यतो निश्चरतिमनश्चञ्चलमस्थिरम्।ततस्ततो नियम्यैतद्आत्मन्येव वशं नयेत्॥॥ ६.२६ ॥
yato yato niścarati manaś cañcalam asthiram / tatas tato niyamyaitad ātmany eva vaśaṁ nayet
हमारे शब्दों में
यह चंचल, अस्थिर मन जहाँ-जहाँ भटक जाए, साधक वहाँ-वहाँ से उसे रोककर लौटाए, और अपने ही भीतर वश में ले आए।