Cited, never invented.
सभी श्लोक
तत्सत् के सत्संगों में आए श्लोक — गीता और दुर्गा सप्तशती से; मूल पाठ और उसका लिप्यंतरण।
सत्संग की हर बात के पीछे अध्याय और श्लोक है — छूकर मूल पाठ और लिप्यन्तरण देखें, और जहाँ अर्थ परखा जा चुका है, हमारे शब्द भी। हम मूल का ही उद्धरण देते हैं, किसी टीका का नहीं।
तत्सत् का भक्ति-सत्संग कैसे बनता हैगीता २.६५
प्रसादे सर्वदुःखानांहानिरस्योपजायते।प्रसन्नचेतसो ह्याशुबुद्धिः पर्यवतिष्ठते॥॥ २.६५ ॥
prasāde sarva-duḥkhānāṁ hānir asyopajāyate / prasanna-cetaso hy āśu buddhiḥ paryavatiṣṭhate
हमारे शब्दों में
मन के निर्मल और प्रसन्न होने पर सारे दुख मिट जाते हैं; जिसका चित्त प्रसन्न है, उसकी बुद्धि जल्दी ही स्थिर हो जाती है।