सभी श्लोकरोज़ दस मिनट का सत्संग।

Cited, never invented.

सभी श्लोक

तत्सत् के सत्संगों में आए श्लोक — गीता और दुर्गा सप्तशती से; मूल पाठ और उसका लिप्यंतरण।

सत्संग की हर बात के पीछे अध्याय और श्लोक है — छूकर मूल पाठ और लिप्यन्तरण देखें, और जहाँ अर्थ परखा जा चुका है, हमारे शब्द भी। हम मूल का ही उद्धरण देते हैं, किसी टीका का नहीं।

तत्सत् का भक्ति-सत्संग कैसे बनता है

श्लोक

गीता १७.१६

मनःप्रसादः सौम्यत्वंमौनमात्मविनिग्रहः।भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते॥॥ १७.१६ ॥

manaḥ-prasādaḥ saumyatvaṁ maunam ātma-vinigrahaḥ / bhāva-saṁśuddhir ity etat tapo mānasam ucyate

हमारे शब्दों में

मन की निर्मल प्रसन्नता, सौम्य स्वभाव, मौन, अपने आप पर संयम और भावों की शुद्धि — यह मन का तप कहलाता है।

शास्त्रों की वाणी से रोज़ की भक्ति तक।

गीता १७.१६ · तत्सत्