Cited, never invented.
सभी श्लोक
तत्सत् के सत्संगों में आए श्लोक — गीता और दुर्गा सप्तशती से; मूल पाठ और उसका लिप्यंतरण।
सत्संग की हर बात के पीछे अध्याय और श्लोक है — छूकर मूल पाठ और लिप्यन्तरण देखें, और जहाँ अर्थ परखा जा चुका है, हमारे शब्द भी। हम मूल का ही उद्धरण देते हैं, किसी टीका का नहीं।
तत्सत् का भक्ति-सत्संग कैसे बनता हैगीता १७.१६
मनःप्रसादः सौम्यत्वंमौनमात्मविनिग्रहः।भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते॥॥ १७.१६ ॥
manaḥ-prasādaḥ saumyatvaṁ maunam ātma-vinigrahaḥ / bhāva-saṁśuddhir ity etat tapo mānasam ucyate
हमारे शब्दों में
मन की निर्मल प्रसन्नता, सौम्य स्वभाव, मौन, अपने आप पर संयम और भावों की शुद्धि — यह मन का तप कहलाता है।