Cited, never invented.
सभी श्लोक
तत्सत् के सत्संगों में आए श्लोक — गीता और दुर्गा सप्तशती से; मूल पाठ और उसका लिप्यंतरण।
सत्संग की हर बात के पीछे अध्याय और श्लोक है — छूकर मूल पाठ और लिप्यन्तरण देखें, और जहाँ अर्थ परखा जा चुका है, हमारे शब्द भी। हम मूल का ही उद्धरण देते हैं, किसी टीका का नहीं।
तत्सत् का भक्ति-सत्संग कैसे बनता हैगीता ६.२५
शनैः शनैरुपरमेद्बुद्ध्या धृतिगृहीतया।आत्मसंस्थं मनः कृत्वान किञ्चिदपि चिन्तयेत्॥॥ ६.२५ ॥
śanaiḥ śanair uparamed buddhyā dhṛti-gṛhītayā / ātma-saṁsthaṁ manaḥ kṛtvā na kiñcid api cintayet
हमारे शब्दों में
साधक धीरे-धीरे, धैर्य से थामी हुई बुद्धि से, शान्त होता जाए; मन को अपने ही भीतर टिकाकर फिर कुछ भी न सोचे।