Cited, never invented.
सभी श्लोक
तत्सत् के सत्संगों में आए श्लोक — गीता और दुर्गा सप्तशती से; मूल पाठ और उसका लिप्यंतरण।
सत्संग की हर बात के पीछे अध्याय और श्लोक है — छूकर मूल पाठ और लिप्यन्तरण देखें, और जहाँ अर्थ परखा जा चुका है, हमारे शब्द भी। हम मूल का ही उद्धरण देते हैं, किसी टीका का नहीं।
तत्सत् का भक्ति-सत्संग कैसे बनता हैगीता २.४१
व्यवसायात्मिका बुद्धिर्एकेह कुरुनन्दन।बहुशाखा ह्यनन्ताश्चबुद्धयोऽव्यवसायिनाम्॥॥ २.४१ ॥
vyavasāyātmikā buddhir ekeha kurunandana / bahu-śākhā hy anantāś ca buddhayo ’vyavasāyinām
हमारे शब्दों में
अर्जुन, इस साधना में जो बुद्धि निश्चय में दृढ़ है, वह एक ही रहती है; पर जिनमें निश्चय नहीं, उनकी बुद्धि बहुत-सी शाखाओं में बँट जाती है, जिनका कोई अंत नहीं।