सभी श्लोकरोज़ दस मिनट का सत्संग।

Cited, never invented.

सभी श्लोक

तत्सत् के सत्संगों में आए श्लोक — गीता और दुर्गा सप्तशती से; मूल पाठ और उसका लिप्यंतरण।

सत्संग की हर बात के पीछे अध्याय और श्लोक है — छूकर मूल पाठ और लिप्यन्तरण देखें, और जहाँ अर्थ परखा जा चुका है, हमारे शब्द भी। हम मूल का ही उद्धरण देते हैं, किसी टीका का नहीं।

तत्सत् का भक्ति-सत्संग कैसे बनता है

श्लोक

गीता २.४१

व्यवसायात्मिका बुद्धिर्एकेह कुरुनन्दन।बहुशाखा ह्यनन्ताश्चबुद्धयोऽव्यवसायिनाम्॥॥ २.४१ ॥

vyavasāyātmikā buddhir ekeha kurunandana / bahu-śākhā hy anantāś ca buddhayo ’vyavasāyinām

हमारे शब्दों में

अर्जुन, इस साधना में जो बुद्धि निश्चय में दृढ़ है, वह एक ही रहती है; पर जिनमें निश्चय नहीं, उनकी बुद्धि बहुत-सी शाखाओं में बँट जाती है, जिनका कोई अंत नहीं।

शास्त्रों की वाणी से रोज़ की भक्ति तक।

गीता २.४१ · तत्सत्