Cited, never invented.
सभी श्लोक
तत्सत् के सत्संगों में आए श्लोक — गीता और दुर्गा सप्तशती से; मूल पाठ और उसका लिप्यंतरण।
सत्संग की हर बात के पीछे अध्याय और श्लोक है — छूकर मूल पाठ और लिप्यन्तरण देखें, और जहाँ अर्थ परखा जा चुका है, हमारे शब्द भी। हम मूल का ही उद्धरण देते हैं, किसी टीका का नहीं।
तत्सत् का भक्ति-सत्संग कैसे बनता हैगीता ९.२६
पत्रं पुष्पं फलं तोयंयो मे भक्त्या प्रयच्छति।तदहं भक्त्युपहृतम्अश्नामि प्रयतात्मनः॥॥ ९.२६ ॥
patraṁ puṣpaṁ phalaṁ toyaṁ yo me bhaktyā prayacchati / tad ahaṁ bhakty-upahṛtam aśnāmi prayatātmanaḥ
हमारे शब्दों में
पत्ता, फूल, फल, जल — जो कोई मुझे भक्ति से देता है, उस सच्चे मन वाले का भक्ति से लाया हुआ वह — मैं ले लेता हूँ।