Cited, never invented.
सभी श्लोक
तत्सत् के सत्संगों में आए श्लोक — गीता और दुर्गा सप्तशती से; मूल पाठ और उसका लिप्यंतरण।
सत्संग की हर बात के पीछे अध्याय और श्लोक है — छूकर मूल पाठ और लिप्यन्तरण देखें, और जहाँ अर्थ परखा जा चुका है, हमारे शब्द भी। हम मूल का ही उद्धरण देते हैं, किसी टीका का नहीं।
तत्सत् का भक्ति-सत्संग कैसे बनता हैगीता १७.२५
तदित्यनभिसन्धायफलं यज्ञतपःक्रियाः।दानक्रियाश्च विविधाःक्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षिभिः॥॥ १७.२५ ॥
tad ity anabhisandhāya phalaṁ yajña-tapaḥ-kriyāḥ / dāna-kriyāś ca vividhāḥ kriyante mokṣa-kāṅkṣibhiḥ
हमारे शब्दों में
‘तत्’ कहकर, फल की चाह रखे बिना, मोक्ष चाहने वाले यज्ञ और तप के कर्म तथा तरह-तरह के दान करते हैं।