Cited, never invented.
सभी श्लोक
तत्सत् के सत्संगों में आए श्लोक — गीता और दुर्गा सप्तशती से; मूल पाठ और उसका लिप्यंतरण।
सत्संग की हर बात के पीछे अध्याय और श्लोक है — छूकर मूल पाठ और लिप्यन्तरण देखें, और जहाँ अर्थ परखा जा चुका है, हमारे शब्द भी। हम मूल का ही उद्धरण देते हैं, किसी टीका का नहीं।
तत्सत् का भक्ति-सत्संग कैसे बनता हैगीता २.४०
नेहाभिक्रमनाशोऽस्तिप्रत्यवायो न विद्यते।स्वल्पमप्यस्य धर्मस्यत्रायते महतो भयात्॥॥ २.४० ॥
nehābhikrama-nāśo ’sti pratyavāyo na vidyate / svalpam apy asya dharmasya trāyate mahato bhayāt
हमारे शब्दों में
इस साधना में आरम्भ किया हुआ कुछ भी खोता नहीं, और न उससे कोई उलटा फल होता है; इस धर्म का थोड़ा-सा पालन भी बड़े भय से बचा लेता है।