Cited, never invented.
सभी श्लोक
तत्सत् के सत्संगों में आए श्लोक — गीता और दुर्गा सप्तशती से; मूल पाठ और उसका लिप्यंतरण।
सत्संग की हर बात के पीछे अध्याय और श्लोक है — छूकर मूल पाठ और लिप्यन्तरण देखें, और जहाँ अर्थ परखा जा चुका है, हमारे शब्द भी। हम मूल का ही उद्धरण देते हैं, किसी टीका का नहीं।
तत्सत् का भक्ति-सत्संग कैसे बनता हैगीता ७.८
रसोऽहमप्सु कौन्तेयप्रभाऽस्मि शशिसूर्ययोः।प्रणवः सर्ववेदेषुशब्दः खे पौरुषं नृषु॥॥ ७.८ ॥
raso 'ham apsu kaunteya prabhāsmi śaśi-sūryayoḥ / praṇavaḥ sarva-vedeṣu śabdaḥ khe pauruṣaṁ nṛṣu
हमारे शब्दों में
अर्जुन, पानी में जो रस है, वह मैं हूँ; चंद्रमा और सूर्य की प्रभा मैं हूँ। सब वेदों में ॐ, आकाश में शब्द और मनुष्यों में सामर्थ्य मैं हूँ।