सभी श्लोकरोज़ दस मिनट का सत्संग।

Cited, never invented.

सभी श्लोक

तत्सत् के सत्संगों में आए श्लोक — गीता और दुर्गा सप्तशती से; मूल पाठ और उसका लिप्यंतरण।

सत्संग की हर बात के पीछे अध्याय और श्लोक है — छूकर मूल पाठ और लिप्यन्तरण देखें, और जहाँ अर्थ परखा जा चुका है, हमारे शब्द भी। हम मूल का ही उद्धरण देते हैं, किसी टीका का नहीं।

तत्सत् का भक्ति-सत्संग कैसे बनता है

श्लोक

गीता ६.३४

चञ्चलं हि मनः कृष्णप्रमाथि बलवद्दृढम्।तस्याहं निग्रहं मन्येवायोरिव सुदुष्करम्॥॥ ६.३४ ॥

cañcalaṁ hi manaḥ kṛṣṇa pramāthi balavad dṛḍham / tasyāhaṁ nigrahaṁ manye vāyor iva su-duṣkaram

हमारे शब्दों में

कृष्ण, यह मन तो बड़ा चंचल है — सब कुछ मथ देनेवाला, बलवान और हठी; इसे थामना मुझे हवा को थामने जैसा बहुत कठिन लगता है।

शास्त्रों की वाणी से रोज़ की भक्ति तक।

गीता ६.३४ · तत्सत्