Cited, never invented.
सभी श्लोक
तत्सत् के सत्संगों में आए श्लोक — गीता और दुर्गा सप्तशती से; मूल पाठ और उसका लिप्यंतरण।
सत्संग की हर बात के पीछे अध्याय और श्लोक है — छूकर मूल पाठ और लिप्यन्तरण देखें, और जहाँ अर्थ परखा जा चुका है, हमारे शब्द भी। हम मूल का ही उद्धरण देते हैं, किसी टीका का नहीं।
तत्सत् का भक्ति-सत्संग कैसे बनता हैगीता १०.२५
महर्षीणां भृगुरहंगिरामस्म्येकमक्षरम्।यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मिस्थावराणां हिमालयः॥॥ १०.२५ ॥
maharṣīṇāṁ bhṛgur ahaṁ girām asmy ekam akṣaram / yajñānāṁ japa-yajño ’smi sthāvarāṇāṁ himālayaḥ
हमारे शब्दों में
महर्षियों में मैं भृगु हूँ, वाणी में एक अक्षर — ॐ; यज्ञों में जप का यज्ञ मैं हूँ, और अचल वस्तुओं में हिमालय।