सभी श्लोकरोज़ दस मिनट का सत्संग।

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सभी श्लोक

तत्सत् के सत्संगों में आए श्लोक — गीता और दुर्गा सप्तशती से; मूल पाठ और उसका लिप्यंतरण।

सत्संग की हर बात के पीछे अध्याय और श्लोक है — छूकर मूल पाठ और लिप्यन्तरण देखें, और जहाँ अर्थ परखा जा चुका है, हमारे शब्द भी। हम मूल का ही उद्धरण देते हैं, किसी टीका का नहीं।

तत्सत् का भक्ति-सत्संग कैसे बनता है

श्लोक

गीता १०.२५

महर्षीणां भृगुरहंगिरामस्म्येकमक्षरम्।यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मिस्थावराणां हिमालयः॥॥ १०.२५ ॥

maharṣīṇāṁ bhṛgur ahaṁ girām asmy ekam akṣaram / yajñānāṁ japa-yajño ’smi sthāvarāṇāṁ himālayaḥ

हमारे शब्दों में

महर्षियों में मैं भृगु हूँ, वाणी में एक अक्षर — ॐ; यज्ञों में जप का यज्ञ मैं हूँ, और अचल वस्तुओं में हिमालय।

शास्त्रों की वाणी से रोज़ की भक्ति तक।

गीता १०.२५ · तत्सत्