Cited, never invented.
सभी श्लोक
तत्सत् के सत्संगों में आए श्लोक — गीता और दुर्गा सप्तशती से; मूल पाठ और उसका लिप्यंतरण।
सत्संग की हर बात के पीछे अध्याय और श्लोक है — छूकर मूल पाठ और लिप्यन्तरण देखें, और जहाँ अर्थ परखा जा चुका है, हमारे शब्द भी। हम मूल का ही उद्धरण देते हैं, किसी टीका का नहीं।
तत्सत् का भक्ति-सत्संग कैसे बनता हैगीता १७.२६
सद्भावे साधुभावे चसदित्येतत्प्रयुज्यते।प्रशस्ते कर्मणि तथासच्छब्दः पार्थ युज्यते॥॥ १७.२६ ॥
sad-bhāve sādhu-bhāve ca sad ity etat prayujyate / praśaste karmaṇi tathā sac-chabdaḥ pārtha yujyate
हमारे शब्दों में
‘सत्’ उसे कहते हैं जो सचमुच है, और जो भला है; वैसे ही, अर्जुन, किसी सराहनीय कर्म को भी ‘सत्’ कहा जाता है।