Cited, never invented.
सभी श्लोक
तत्सत् के सत्संगों में आए श्लोक — गीता और दुर्गा सप्तशती से; मूल पाठ और उसका लिप्यंतरण।
सत्संग की हर बात के पीछे अध्याय और श्लोक है — छूकर मूल पाठ और लिप्यन्तरण देखें, और जहाँ अर्थ परखा जा चुका है, हमारे शब्द भी। हम मूल का ही उद्धरण देते हैं, किसी टीका का नहीं।
तत्सत् का भक्ति-सत्संग कैसे बनता हैगीता ९.३१
क्षिप्रं भवति धर्मात्माशश्वच्छान्तिं निगच्छति।कौन्तेय प्रतिजानीहिन मे भक्तः प्रणश्यति॥॥ ९.३१ ॥
kṣipraṁ bhavati dharmātmā śaśvac-chāntiṁ nigacchati / kaunteya pratijānīhi na me bhaktaḥ praṇaśyati
हमारे शब्दों में
वह जल्दी ही धर्मात्मा होकर सदा की शान्ति पा लेता है। अर्जुन, यह निश्चय के साथ कहो — मेरा भक्त कभी खोता नहीं।