Cited, never invented.
सभी श्लोक
तत्सत् के सत्संगों में आए श्लोक — गीता और दुर्गा सप्तशती से; मूल पाठ और उसका लिप्यंतरण।
सत्संग की हर बात के पीछे अध्याय और श्लोक है — छूकर मूल पाठ और लिप्यन्तरण देखें, और जहाँ अर्थ परखा जा चुका है, हमारे शब्द भी। हम मूल का ही उद्धरण देते हैं, किसी टीका का नहीं।
तत्सत् का भक्ति-सत्संग कैसे बनता हैगीता १२.१३
अद्वेष्टा सर्वभूतानांमैत्रः करुण एव च।निर्ममो निरहङ्कारःसमदुःखसुखः क्षमी॥॥ १२.१३ ॥
adveṣṭā sarva-bhūtānāṁ maitraḥ karuṇa eva ca / nirmamo nirahaṅkāraḥ sama-duḥkha-sukhaḥ kṣamī
हमारे शब्दों में
जो किसी भी प्राणी से द्वेष नहीं करता, सबसे मैत्री रखता है और करुणा से भरा है; जिसमें न ‘मेरा-मेरा’ है, न अहंकार; जो दुख-सुख में एक-सा रहता है और क्षमाशील है…