सभी श्लोकरोज़ दस मिनट का सत्संग।

Cited, never invented.

सभी श्लोक

तत्सत् के सत्संगों में आए श्लोक — गीता और दुर्गा सप्तशती से; मूल पाठ और उसका लिप्यंतरण।

सत्संग की हर बात के पीछे अध्याय और श्लोक है — छूकर मूल पाठ और लिप्यन्तरण देखें, और जहाँ अर्थ परखा जा चुका है, हमारे शब्द भी। हम मूल का ही उद्धरण देते हैं, किसी टीका का नहीं।

तत्सत् का भक्ति-सत्संग कैसे बनता है

श्लोक

गीता ६.३२

आत्मौपम्येन सर्वत्रसमं पश्यति योऽर्जुन।सुखं वा यदि वा दुःखंस योगी परमो मतः॥॥ ६.३२ ॥

ātmaupamyena sarvatra samaṁ paśyati yo 'rjuna / sukhaṁ vā yadi vā duḥkhaṁ sa yogī paramo mataḥ

हमारे शब्दों में

अर्जुन, जो हर कहीं सबका सुख-दुख अपने जैसा ही देखता है, वही परम योगी माना गया है।

शास्त्रों की वाणी से रोज़ की भक्ति तक।

गीता ६.३२ · तत्सत्