Cited, never invented.
सभी श्लोक
तत्सत् के सत्संगों में आए श्लोक — गीता और दुर्गा सप्तशती से; मूल पाठ और उसका लिप्यंतरण।
सत्संग की हर बात के पीछे अध्याय और श्लोक है — छूकर मूल पाठ और लिप्यन्तरण देखें, और जहाँ अर्थ परखा जा चुका है, हमारे शब्द भी। हम मूल का ही उद्धरण देते हैं, किसी टीका का नहीं।
तत्सत् का भक्ति-सत्संग कैसे बनता हैगीता ६.३२
आत्मौपम्येन सर्वत्रसमं पश्यति योऽर्जुन।सुखं वा यदि वा दुःखंस योगी परमो मतः॥॥ ६.३२ ॥
ātmaupamyena sarvatra samaṁ paśyati yo 'rjuna / sukhaṁ vā yadi vā duḥkhaṁ sa yogī paramo mataḥ
हमारे शब्दों में
अर्जुन, जो हर कहीं सबका सुख-दुख अपने जैसा ही देखता है, वही परम योगी माना गया है।