Cited, never invented.
सभी श्लोक
तत्सत् के सत्संगों में आए श्लोक — गीता और दुर्गा सप्तशती से; मूल पाठ और उसका लिप्यंतरण।
सत्संग की हर बात के पीछे अध्याय और श्लोक है — छूकर मूल पाठ और लिप्यन्तरण देखें, और जहाँ अर्थ परखा जा चुका है, हमारे शब्द भी। हम मूल का ही उद्धरण देते हैं, किसी टीका का नहीं।
तत्सत् का भक्ति-सत्संग कैसे बनता हैगीता ६.२७
प्रशान्तमनसं ह्येनंयोगिनं सुखमुत्तमम्।उपैति शान्तरजसंब्रह्मभूतमकल्मषम्॥॥ ६.२७ ॥
praśānta-manasaṁ hy enaṁ yoginaṁ sukham uttamam / upaiti śānta-rajasaṁ brahma-bhūtam akalmaṣam
हमारे शब्दों में
जिस योगी का मन पूरी तरह शान्त है, उत्तम सुख उसी के पास चला आता है — जिसके भीतर की हलचल थम गई है, जो ब्रह्म में बसा है और निर्मल है।