सभी श्लोकरोज़ दस मिनट का सत्संग।

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सभी श्लोक

तत्सत् के सत्संगों में आए श्लोक — गीता और दुर्गा सप्तशती से; मूल पाठ और उसका लिप्यंतरण।

सत्संग की हर बात के पीछे अध्याय और श्लोक है — छूकर मूल पाठ और लिप्यन्तरण देखें, और जहाँ अर्थ परखा जा चुका है, हमारे शब्द भी। हम मूल का ही उद्धरण देते हैं, किसी टीका का नहीं।

तत्सत् का भक्ति-सत्संग कैसे बनता है

श्लोक

गीता ६.२७

प्रशान्तमनसं ह्येनंयोगिनं सुखमुत्तमम्।उपैति शान्तरजसंब्रह्मभूतमकल्मषम्॥॥ ६.२७ ॥

praśānta-manasaṁ hy enaṁ yoginaṁ sukham uttamam / upaiti śānta-rajasaṁ brahma-bhūtam akalmaṣam

हमारे शब्दों में

जिस योगी का मन पूरी तरह शान्त है, उत्तम सुख उसी के पास चला आता है — जिसके भीतर की हलचल थम गई है, जो ब्रह्म में बसा है और निर्मल है।

शास्त्रों की वाणी से रोज़ की भक्ति तक।

गीता ६.२७ · तत्सत्